डोंग-क्यंग अपने माता-पिता के निधन के बाद से ही लगातार मेहनत करती आ रही है। एक दिन उसे पता चलता है कि उसे ब्रेन कैंसर है। अपनी बदनसीबी से तंग आकर, वह पूरी दुनिया के खत्म हो जाने की दुआ करती है और अनजाने में म्यूल मंग को बुला बैठती है, जो इंसानों और देवता के बीच का दूत है। आखिरी उम्मीद थामे, वह म्यूल मंग से सौ दिनों का सौदा करती है अपनी शर्तों पर जीने के लिए, भले ही इसमें उसे सब कुछ खोने का खतरा हो।